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बच्चों की पहल से बदली व्यवस्था, तुरसानी स्कूल में नियुक्त हुआ नया शिक्षक।

बच्चों की पहल से बदली व्यवस्था, तुरसानी स्कूल में नियुक्त हुआ नया शिक्षक

कोयलीबेड़ा। कहते हैं कि बदलाव की शुरुआत कभी भी, कहीं से भी हो सकती है—और इस बार इस बदलाव की शुरुआत की है कुछ छोटे बच्चों ने। कोयलीबेड़ा विकासखंड के अंतर्गत आने वाली शासकीय प्राथमिक शाला तुरसानी में लंबे समय से शिक्षक की कमी से बच्चे शिक्षा से वंचित हो रहे थे। विद्यालय में पदस्थ शिक्षक के निलंबन के बाद स्कूल एकल शिक्षकीय होकर रह गया था। शिक्षण कार्य प्रभावित हो रहा था, बच्चों की पढ़ाई रुक गई थी और विद्यालय का वातावरण सूना पड़ा था।

शाला प्रबंधन समिति और ग्रामीणों ने इस स्थिति को सुधारने के लिए लगातार प्रयास किए। उन्होंने सांसद, विधायक और कलेक्टर सहित कई अधिकारियों को ज्ञापन सौंपे, लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी तुरसानी स्कूल के लिए शिक्षक की नियुक्ति नहीं हो सकी। शासन-प्रशासन की चुप्पी और अनदेखी से निराश होकर बच्चों ने ही आगे आकर अपने अधिकार के लिए आवाज़ उठाने का निश्चय किया।

बच्चों ने स्कूल में ताला जड़ दिया और तीन किलोमीटर की दूरी पैदल तय करते हुए कोयलीबेड़ा खंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय पहुंच गए। इस दौरान उन्होंने नारेबाजी कर अपने गुस्से और दुःख को जाहिर किया। उनका कहना था कि जब तक शिक्षक की व्यवस्था नहीं की जाती, वे स्कूल की चाबी अधिकारियों को सौंप देंगे। इस पूरे विरोध प्रदर्शन में उनके पालक भी मौजूद रहे, जिन्होंने बच्चों का हौसला बढ़ाया और प्रशासन से तत्काल समाधान की मांग की।

घटना की जानकारी मिलते ही शिक्षा विभाग हरकत में आया। सहायक खंड शिक्षा अधिकारी अशोक टांडिया ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए तत्काल कार्रवाई की। उन्होंने व्यवस्थापन के तहत कोयलीबेड़ा में पदस्थ शिक्षक रैजू राम मंडावी को तुरसानी विद्यालय के लिए आदेशित कर दिया। आदेश जारी होते ही ग्रामीणों और पालकों में खुशी की लहर दौड़ गई। बच्चों ने भी प्रसन्नता जताई कि उनकी आवाज़ आखिरकार सुनी गई।

यह घटना पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गई है। लोग बच्चों की हिम्मत और जागरूकता की प्रशंसा कर रहे हैं। जहां वयस्कों के प्रयास विफल रहे, वहीं बच्चों ने अपनी एकजुटता और दृढ़ संकल्प से यह साबित कर दिया कि बदलाव की राह उम्र नहीं, इरादा तय करता है। तुरसानी के इन नन्हे विद्यार्थियों ने यह सिखाया है कि जब अधिकारों की बात हो, तो आवाज़ उठाना ही सबसे बड़ा कदम होता है।

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