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परंपरा, एकता और संस्कृति का संगम बना कोलांग महोत्सव, भव्य आयोजन के साथ हुआ सम्पन्न।

परंपरा, एकता और संस्कृति का संगम बना कोलांग महोत्सव, भव्य आयोजन के साथ हुआ सम्पन्न।

कोयलीबेड़ा। पदल परगना के कामतेड़ा गांव में आयोजित दो दिवसीय कोलांग महोत्सव भव्य सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और सामाजिक संदेशों के साथ सम्पन्न हो गया। हर वर्ष आयोजित होने वाला यह महोत्सव आदिवासी समाज की तेजी से लुप्त होती परंपराओं, लोक नृत्यों और सांस्कृतिक मूल्यों को सहेजने का सशक्त प्रयास है। महोत्सव के दौरान कोयलीबेड़ा अंचल सहित भोमरा, कालपाट, पदल, हुरेवाही और कोलर परगना से पहुंचे कलाकारों ने कोलांग, चिटकुल, छेरका, पुन्नी नाच जैसे पारंपरिक नृत्यों की आकर्षक प्रस्तुतियां दीं, जिन्हें देखने बड़ी संख्या में ग्रामीणजन उपस्थित रहे।
समापन समारोह में समाज के विभिन्न संगठनों के पदाधिकारी और सामाजिक प्रतिनिधि विशेष रूप से मौजूद रहे। कार्यक्रम में राजेश भास्कर (जिलाध्यक्ष, गोंडवाना समन्वय समिति), कन्हैया उसेंडी (जिलाध्यक्ष, सर्व आदिवासी समाज), सदेसिंह कोमरा (सहसचिव, संभागीय गोंडवाना समिति), शिव तुमरेटी (जिलाउपाध्यक्ष, गोंडवाना समन्वय समिति), प्रकाश दिवान (कांकेरगढ़ अध्यक्ष, हल्बा समाज), चंद्रहास नेताम (जिलाध्यक्ष, कंडरा समाज), विकेश हिचामी (प्रदेश संगठन मंत्री, गोंडवाना समन्वय समिति), सहदेव उसेंडी (अध्यक्ष, सर्व आदिवासी समाज इकाई कोयलीबेड़ा), बिसनाथ दर्रो (अध्यक्ष, गोंडवाना समाज कोयलीबेड़ा इकाई), मोहन हुपेंडी (कोषाध्यक्ष, सर्व आदिवासी समाज) तथा पीलू राम उसेंडी (सचिव, सर्व आदिवासी समाज कोयलीबेड़ा इकाई),हेमा हुपेंडी ( अध्यक्ष सरपंच संघ ), सनकु उसेंडी, दीपक आचला, केदूराम पोटाई, सुखिराम उसेंडी सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए गोंडवाना समन्वय समिति के जिलाध्यक्ष राजेश भास्कर ने कहा कि कोलांग महोत्सव जैसे आयोजन आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करते हैं। आज के बदलते समय में जब युवा पीढ़ी अपनी परंपराओं से दूर होती जा रही है, तब ऐसे आयोजनों के माध्यम से उन्हें अपनी जड़ों से जोड़ना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने समाज से आह्वान किया कि अपनी भाषा, वेशभूषा और लोक कलाओं को अपनाकर ही हम अपनी पहचान को बचा सकते हैं।
सर्व आदिवासी समाज के जिलाध्यक्ष कन्हैया उसेंडी ने अपने उद्बोधन में कहा कि आदिवासी समाज की असली शक्ति उसकी एकता और संस्कृति में निहित है। कोलांग महोत्सव केवल मनोरंजन का मंच नहीं है, बल्कि यह सामाजिक जागरूकता और सांस्कृतिक चेतना का माध्यम है। उन्होंने युवाओं को शिक्षा के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत को आत्मसात करने की प्रेरणा दी।
संभागीय गोंडवाना समिति के सहसचिव सदेसिंह कोमरा ने कहा कि पारंपरिक नृत्य और लोक कलाएं आदिवासी जीवन दर्शन का प्रतिबिंब हैं। इन नृत्यों में प्रकृति, समाज और सामूहिक जीवन की झलक मिलती है। उन्होंने कहा कि यदि समाज को अपनी पहचान बनाए रखनी है, तो ऐसे आयोजनों को निरंतर आयोजित करना होगा और नई पीढ़ी को इसमें सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करना होगा।
वहीं सर्व आदिवासी समाज इकाई कोयलीबेड़ा के अध्यक्ष सहदेव उसेंडी ने अपने वक्तव्य में कहा कि कोलांग महोत्सव का आयोजन ग्रामीणों की सामूहिक सहभागिता और सामाजिक एकजुटता का परिणाम है। उन्होंने कहा कि यह महोत्सव हमारी परंपराओं को सहेजने के साथ-साथ समाज को संगठित करने का भी कार्य करता है। सहदेव उसेंडी ने युवाओं से आग्रह किया कि वे अपनी लोक कला, नृत्य और सांस्कृतिक आयोजनों से जुड़ें तथा इन्हें आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभाएं, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व कर सकें।
महोत्सव के सफल आयोजन से पूरे क्षेत्र में उत्साह का माहौल रहा। कार्यक्रम के अंत में आयोजन समिति की ओर से सभी अतिथियों, कलाकारों और ग्रामीणों का आभार व्यक्त किया गया। कोलांग महोत्सव एक बार फिर आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपरा और एकता का सशक्त प्रतीक बनकर उभरा।

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