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कम पानी की आवश्यकता वाली दलहन-तिलहन फसलों की पैदावार पर जोर।धान के बदले दलहन-तिलहन एवं मक्का की फसल लेने कृषकों को किया जा रहा प्रोत्साहित।

*कम पानी की आवश्यकता वाली दलहन-तिलहन फसलों की पैदावार पर जोर*
*धान के बदले दलहन-तिलहन एवं मक्का की फसल लेने कृषकों को किया जा रहा प्रोत्साहित*

उत्तर बस्तर कांकेर, 22 नवम्बर 2024/ ग्रीष्मकालीन धान के बदले अन्य लाभकारी फसल लेने जिले के किसानों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। जिले में खरीफ के मौसम में तो धान की खेती बहुतायत मात्रा में की जाती है, किन्तु ऐसे किसान जिनके पास सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है, उनके द्वारा रबी के मौसम में भी धान की खेती की जाती है, जिससे भूमिगत जल का अनावश्यक दोहन होता है। उप संचालक कृषि ने बताया कि एक एकड़ ग्रीष्म धान में लगने वाले आवश्यक सिंचाई जल से 2.5 एकड़ में मक्का एवं 3 एकड़ में दलहल, तिलहन की खेती की जा सकती है, जिससे गिरते हुए भू-जल स्तर को भी रोकने में मदद मिलेगी। साथ ही कृषकों की आय में बढ़ोतरी होगी और ग्रीष्मकालीन धान के बदले फसल चक्र में दलहनी फसलों के समावेश से भूमि में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ेगी, जिससे मृदा उर्वरता में वृद्धि होगी।
भूजल स्तर बना रहे तथा मूलभूत आवश्यकताओं के लिए जल संसाधन की कमी न पड़े, इसके लिए राज्य सरकार द्वारा लगातार किसानों को धान के बजाय दलहन-तिलहन और अन्य सब्जीवर्गीय फसलों की पैदावार लेने के लिए समझाइश दी जाती है। वहीं मिट्टी की उर्वराशक्ति और कीट मित्र जीवित रहे, इसके फसल चक्र परिवर्तन पर जोर दिया जाता है। कृषि में दलहन-तिलहनी फसलें शामिल करके कीट-व्याधियों के जीवन चक्र में बाधा उत्पन्न कर इनके प्रकोप में कमी की जा सकती है। साथ ही रासायनिक कीटनाशकों व व्याधिनाशक दवाओं के उपयोग में कमी होने पर भूमि व जल स्त्रोतों के जहरीले होने से मुक्ति मिलेगी। इसके साथ ही ग्रीष्मकालीन धान जिनकी जड़ें उथली होती हैं, उनके बजाय दलहन-तिलहन लगाने से जड़ों के अधिक फैलाव के कारण भूमि क्षरण की समस्या से भी बचा जा सकता है और खरपतवारों को काफी हद तक नियंत्रित करने में भी सहायता मिलती है।
उप संचालक कृषि ने यह भी बताया कि ग्रीष्मकालीन धान के बदले अन्य लाभकारी फसलों की खेती के लिए व्यापक प्रचार-प्रसार कृषकों को प्रशिक्षण व पर्याप्त मात्रा में ग्रीष्मकालीन फसलों के बीजों की उपलब्धता व प्रोत्साहन विभाग के द्वारा सुनिश्चित की जा रही है। विभाग के द्वारा ग्रीष्मकालीन धान के बदले दलहन, तिलहन, मक्का की फसल का प्रदर्शन लगाने पर 5000 रूपए की आदान सामग्री उपलब्ध करवाई जाती है। विकासखंड स्तर पर विभागीय अधिकारियों तथा कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिकों द्वारा प्रशिक्षण आयोजित कर कृषकों को सलाह दी जा रही है। ग्रीष्मकालीन धान की खेती करने से भू-जल स्तर वर्ष दर वर्ष नीचे जा रहा है, जिसके कारण गर्मी में ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल की समस्या उत्पन्न होती है। ग्रीष्मकालीन धान के बदले दलहन, तिलहन व मक्का की खेती कर आसानी से लाभ प्राप्त करने के साथ ही भूमि की उर्वरा शक्ति को भी बढ़ाया जा सकता है। इस प्रकार दलहन-तिलहन फसलों में कृषकों के साथ-साथ भूमि की उर्वरता, भूजल स्तर में सुधार व अनेक प्रकार के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष लाभ हैं जिसका उपयोग कर किसान समृद्ध व खुशहाल जीवन की ओर अग्रसर होंगे।

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